एक दिन काशी में गंगा तट की ओर जा रहे शंकराचार्य ने एक चंडाल को देख कर ज्यों ही "गच्छ दूरम "(दूर रहो ) कहा तो उस चंडाल ने कहा "महात्मन दूर हटो से आपका अभिप्राएय क्या है ,देह(शरीर) से या देहि (आत्मा ) से . यह शरीर अन्न से परिपुष्ट होने के कारण अन्नमय कहलाता है , तो क्या एक अन्नमय दूसरे अन्नमय से भिन्न है.
चंडाल पूछता है "क्या आप जैसे ब्रह्मज्ञ और अद्वेत्वादी के लिए ब्रह्मण और चंडाल का भेद उचित है.गंगाजल और मदिरा में सूर्य के प्रतिबिम्ब भले ही भिन्न हों पर दोनों में बिम्ब्भूत सूर्य तो एक ही है .
चंडाल के शब्दों ने आचर्य शंकर को झकझोर डाला, वह बोल उठे "हे शम्भो देह द्रिस्ट से आप का दास हूँ और जीव द्रिस्ट से आपका अंश . मैं आपसे किसी प्रकार भिन्न नहीं हूँ .
" हर हर महादेओ" "ॐ नमह शिवाय "
सद गुरुदेओ भगवन की जय
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