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सोमवार, 23 जुलाई 2012


जब आप तनहाई में होते हैं तो विचारों /चिंतन का अविरल
प्रवाह बहुत कुछ कहने लगता है ......यदि आपको ठहर कर
सुनने की फुर्सत हो तो बहुत कुछ उद्भासित होने लगता है ....
ऐसे ही कुछ ठहरे पलों में मेरे मन में  उगे विचारों की बानगी इन
पंक्तियों में व्यक्त है .........
चेतना
चिरंतन सत्य का वचन ,
कथा की बांसुरी ,
वाचक की वाणी ,
व्यथा की अभिव्यक्ति है .
क्या
जीवन के अप्रतिम आकर्षण में
आप
स्वयं को तो नहीं भुला रहे हैं,
क्या
धूप की चादर में
रोशनी टांकती किरणों में
आप
अंधकार का आलेख तो नहीं लिख  रहे हैं
हो सकता है
आप खुद में
कुछ नया तलाशने के प्रयास में
जो सहज सरल साध्य था
उसे भी
जटिल, दुरूह करदेने में ही
अपना
पांडित्य , पुरषार्थ, उत्कर्ष एवं उपलब्धि
मानते हों

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