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बुधवार, 25 जुलाई 2012


मुनव्वर मां के आगे यूँ कहीं बेजार न होना
जहाँ पर नीव हो , इतनी नमी अच्छी नहीं होती .
                                            मुन्नवर राना
  सावन के इस भीगते मौसम में  माँ की यादें फिर आंखे गीली कर  गयीं. हमें याद आता जब हम खेतों पर जाते थे , और काम की देख भाल में घर आने में देर होने लगती थी , माँ का बार बार फ़ोन कर के जल्दी आने का कहना ,रह रह कर याद आता है . माँ क्या चली गयी ये घर अकेला हो गया
              माँ की ममता भरी छांव से वंचित होना वट वृक्छ की छाया से वंचित होना है. सहना ही शेष रह जाता है

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