जीवन की यात्रा में बहुत कुछ पढ़ा , सुना , देखा, और महसूस भी किया . इस तरह यात्रा जारी रही . कुछ संवाद, वक्तव्य ऐसे होते हैं जो आप की यात्रा के पाथेय हो जाते हैं .कुछ ऐसी ही यादों से आप को सहभागी बनाऊं
एको अहम् बहु स्याम
बहुर अहम् एको स्याम
उपनिषद के परमात्मा को अकेला रहना अच्छा नहीं लगा उसने संकल्प किया मैं बहुत हो जाऊं
स्रावान्धरा के परमात्मा को बहुत रहना अच्छा नहीं लगा उसने संकल्प किया मैं एक हो जाऊं
इन दोनों रूपकों के अपने अपनर अर्थ हैं
हमारी चेतना जब अन्दर से बाहर की ओर फैलती है तब संसार घटित होता है
जब हमारी चेतना बाहर से अंदर की ओर सिमटती है तब मोक्ष घटित होता है
संसार में आदमी अनेक होता है पर मोक्ष में एक होता है
क्रमशः
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