.तुम चिरंतन सत्य प्रियतम ,
मैं निरंतर साधना हूँ .
वेदना की तप्त सिकता,
में बहे जलधार बन कर,
भाव के सूने निलय में
आ बसे तुम कौन मधुकर
तुम प्रलय की दीप ज्वाला
मैं सृजन की कामना हूँ ,
निशा का निस्पंद अंतर
है विकल किसकी व्यथा में
ओस बन बन ढल रही
यह वेदना किसकी कथा में,
तुम व्यथा की मूक गरिमा
मैं मुखर कवि भावना हूँ .
बहुत सुन्दर कविता है भैया .....और भी सुन ने की इच्छा है ...
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